Main_menu

The Story of Monk who Conquered Fear

Monk who Conquered Fear

 

चीन की एक बडी प्रसिद्ध कथा है फकीर की बडी ख्याति हो गई । ख्याति हो गई कि वह निर्भय हो गया है और निर्भयता अंतिम लक्षण है एक दूसरा फकीर उसके दर्शन को आया। वह फकीर जो निर्भय हो गया था, समस्त भयों से मुक्त हो गया था, बैठा था एक चट्टान पर । साँझ का वक्त और पास ही सिह दहाड़ रहे थे । मगर वह बैठा था शति, जेसे कुछ भी नहीं हो रहा है । दूसरा फकीर जाया, तो सिंहों की दहाड़ सुनकर कॉंपने लगा । निर्भय हो गया फकीर बोता, “अरे , तो तुम्हें अभी भी भय लगता है! तुम अभी भी भयभीत हो! फिर क्या खाक साधना की, क्या ध्यान साधा, क्या समाधि पाई! काँप रहे हो सिंह की आवाज़ से, अभी तो अमृत का तुम्हें दर्शन नहीं हुआ । मृत्यु तुम्हें पकड़े हुए है !” उस काँपते फकीर ने कहा, “मुझे बडी जोर की प्यास लगी है । पहले पानी, फिर बात हो सकेगी । मेरा कंठ सूख रहा है, मैं बोल न सकूँगा ।”

निर्भय हो गया फकीर अपनी गुफा में गया पानी लेने । जब वह भीतर गया,उस दूसरे फकीर ने, जहाँ पर बैठा था निर्भय फ़कीर, उस पत्थर पर लिख दिया बड़े बड़े अक्षरों में : नमो बुध्दाय -बुद्ध को ही नमस्कार । आया फ़क़ीर पानी लेकर । जैसे ही उसने पैर आगे बढाया चट्टान पर, नमो बुध्दाय पर पैर पड़ गया, मंत्र पर पैर पड़ गया; झिझक गया वह एक क्षण । आगंतुक फकीर हँसने लगा और कहा, “डर तो अभी तुम्हारे भीतर भी है । सिह से न डरते हो, लेकिन पत्थर पर मैंने एक शब्द लिख दिया-नमो बुध्दाय इस पर पैर पड़ने से तुम काँप गए । भय तो अभी तुममें भी है । भय ने सिर्फ रूप बदला है, बाहर से भीतर जा छिपा है, चेतन से अचेतन हो गया है । भय कहीं गया नहीं है ।”

(निर्भय आदमी में भय नहीं जाता, भय सिर्फ नये रूप ले लेता है, निर्भयता का आवरण ओढ लेता है । जो व्यक्ति समाधिस्थ होता है, वह न तो भयभीत होता हैं और न ही निर्भय होता हैं । निर्भय होने के लिए भी भय का होना जरुरी नहीं हैं, नहीं तो निर्भय कैसे होगे ? विरक्त होने के लिए आसक्ति का होने जरुरी हैं, नहीं तो विरक्त कैसे होंगे ? )

This story was from one of the discourses of Osho – The great Meditation Master.

, , ,

No comments yet.

Leave a Reply

CommentLuv badge

Meditate Daily. Be Calm

Pin It on Pinterest

Share This